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मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

कहीं न जाना खबर दिखाने का वादा है.



एंकर बोली इस चैनल में सच ज्यादा है.
कहीं न जाना खबर दिखाने का वादा है.

एक खबर पर दो घंटे का हल्ला काटा,
बोली फिर विज्ञापन की थोड़ी बाधा है.

पांच मिनट में लौट के आई, बैठे रहना.
अब तक जो तुमने देखा वो सच आधा है.

दो घंटे में ही दिमाग का दही बन गया,
मट्ठा बनाके छोड़ेंगे, ये आमादा है.

अब भी टीवी से चिपका है, क्या गुलाम है,
किसने कहा देख "बूँद" किसने लादा है?

("बूँद")

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

उनके तम्बू, उनका चिंतन

उनके तम्बू, उनका चिंतन, उनके झंडे, उनकी चाल.
उनका मोदी, उनका राहुल, उनके पंजे, उनका जाल.

न्यूज चैनल उनपे बोलें, उनका पेशा, उनका धंधा,
उनका पी.एम., उनका सी.एम., उनका पैसा, उनका माल.

तुमको क्यों ये फ़िक्र है मोदी हो या राहुल निजाम,
उनकी सत्ता, उनके मंत्री, हम क्यों नोचें अपनी खाल.

उनकी चिंता, उनकी उलझन, वो खुद अपना सर नोचें,
उनकी बातें, उनके मसले, उनके पंजे, उनके बाल.

उनकी चिंता वो जाने, तुमको क्या मतलब है "बूँद"
जो भी होगा, उनका होगा, हम रहेंगे अपने हाल.

(बूँद)

२२  जनवरी २०१३

ख़्वाब के सौदागर

ख़्वाब अधूरे, दुनियां पूरी, मायूसी तो खलती है.
सुबह उजाला कितना लाये, शाम तो यूँ ही ढलती है.

ख़्वाब हैं झूठे, यूटोपिया है, यकीन जिंदा है फिर भी,
रोज़ ही नारे लगते हैं और रोज़ मशालें जलती हैं.

ख़्वाब बेचकर बहुतों ने तो बंगले-कोठी बना लिए,
ख्वाब की उम्मीदों में गरीबी आज भी आँखें मलती हैं.

ख़्वाब के सौदागर पर अपना गुस्सा तू क्यों थूके "बूँद",
विज्ञापन से ही तो उनकी दुकानदारी चलती है.

---
"बूँद"
०१-०२-२०१३

सूरदास लिख रहे हैं अब कबीर चाहिए.

सूरदास लिख रहे हैं अब कबीर चाहिए.
खून खत्म हो रहा है अब अबीर चाहिए.

आँख, कान, होंठ तो चुपचाप लौट आ गए.
घर की दीवारों को कलम और तीर चाहिए.

होंठ में ताकत कहाँ जो बात सच्ची कह सके,
मूक-बघीरों को तो काली लकीर चाहिए.

गली में जलती हुई इक झोपड़ी की आंच में,
पकने वाली भावना को शब्द खीर चाहिए.

...
"बूँद"
०२-०२-२०१३
०२:०९ अपरान्ह.

सोमवार, 7 मई 2012

वक्त अपना बर्बाद करें क्यों?



हर पल उनको याद करें क्यों?
वक्त अपना बर्बाद करें क्यों?

दिल के जख्म उभर आयेंगे,
पैदा वो हालात करें क्यों?

अतीत जो इतिहास बन गया,
फिर उसका अनुवाद करें क्यों?

जिसका कोई नहीं है हासिल,
ऐसी कोई बात करें क्यों?

हाथ मिलेंगे, दिल न मिलेंगे,
फिर उनसे मुलाक़ात करें क्यों?
 .........
“बूँद”
२८.१२.२००८
(पिथौरागढ़)

शनिवार, 5 मई 2012

ये रिश्ता एक पहेली है....


सबकुछ है और कुछ भी नहीँ, ये रिश्ता एक पहेली है
हमदम है और नहीँ भी है, तू कैसी सखी-सहेली है?

दिल के क़रीब होकर भी क्योँ अनजानी सी लगती है?
साथ बिताए पल-छिन, फिर भी, दुल्हन नई-नवेली है.

तू बैठी है पास ही मेरे, फिर भी ये क्योँ लगता है?
जीवन नैया आज भँवर मेँ तन्हा और अकेली है.

धुंध है छाई रिश्तोँ मेँ और जीवन भूल-भुलैया है,
प्यार है तेरा परी सरीखा, दिल भी एक हवेली है.

रिश्ता तेरा-मेरा, जाने कैसा अज़ब-अनोखा है?
हाथोँ मेँ तेरा हाथ है, फिर भी, खाली मेरी हथेली है.
...............
"बूँद"
12 मई 2007
(पिथौरागढ़)

लिख पाया नहीँ नज़्म, कहो तो ये ग़ज़ल दूँ...



तस्वीर मेँ कोई अलहदा रंग कैसे मैँ मल दूँ.?
आदत है पुरानी ये, कहो कैसे बदल दूँ?

हर बार ये कहती हो सुना दो कोई तो नज़्म।
लिख पाया नहीँ नज़्म, कहो तो ये ग़ज़ल दूँ।।

ग़ुज़री है उदासी मेँ मेरी सारी ज़िँदग़ी।
तुम आओ! इसे अब ख़ुशी के एक दो पल दूँ।।

मुश्किल है रहग़ुज़र मेँ सफ़र तन्हा ग़ुज़रना।
मिलता नहीँ सूकूँ, कहो किस राह को चल दूँ?

कहती हो रहो ख़ुश, हमेशा मुस्कुराओ "बूँद"
तुम ही कहो, इस बूँद को मैँ कैसी शकल दूँ?
...............
"बूँद"
1 अक्टूबर 2009
(पिथौरागढ़)

समय है खुद को भी पहचानो...


लोकतंत्र के आप समर्थक.
वोट दिया, पर गया निरर्थक.

आप वहीँ हैं, जहाँ पै मैं हूँ.
देखो कहाँ पहुँच गए वो ठग.

जिनके पीछे आप चले थे.
कहाँ पहुच गए उनके वो पग.

आप बूथ तक गए थे पैदल.
वो तो उड़ गए, वो तो थे खग.

उनको तो कुर्सी भी मिल गयी.
आपके पाँव अभी भी डगमग.

समय है खुद को भी पहचानो.
समझो अपनी भी दुखती रग.

लोकतंत्र है बना लोक से.
तंत्र बदल दो, आपका ये जग.

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विक्रम नेगी "बूँद"
दिनांक १४-०३-२०१२
समय- ०१:५८ प्रातः.
(डीडीहाट)
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