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शनिवार, 5 मई 2012

नन्ही कलम की बातेँ बड़ी...



नन्ही कलम की बातेँ बड़ी
तुमने लिखी और मैँने पढ़ी
पढ़ते भी रहना लिखते भी रहना
देखो न टूटे कभी ये कड़ी

दिखने मेँ है ये दुबली पतली
लेकिन इसी ने दुनियाँ बदली
इसने ही कविता कहानी गढ़ी
नन्ही कलम की बातेँ बड़ी

स्याही की सरिता मेँ ये बह चली
गाती हँसाती है ये मनचली
शब्दोँ की मणियोँ से शोभित छड़ी
नन्ही कलम की बातेँ बड़ी

इसने ही सपनोँ की दुनियाँ बुनी
दुखियोँ ग़रीबोँ की इसने सुनी
इसने बुराई से है जंग लड़ी
नन्ही कलम की बातेँ बड़ी
..............
"बूँद"

अपना पसीना तेल है प्यारे....


अपना पसीना तेल है प्यारे
सब पैसे का खेल है प्यारे
ख़बरेँ आमदनी का ज़रिया
भाड़ मेँ जाये सोच नज़रिया
नहीँ पसीने का कोई मोल
बुरे वचन तू अब मत बोल
सब कुछ अच्छा कहता जा रे
हो जायेँगे वारे न्यारे

जनता की चीखोँ को छोड़
देख वो छीँक रहा अमिताभ
आम नहीँ बस खास को देख
अगर तुझे पाना है लाभ
सच को अब सूली पे लटका
ख़बर दिखा-विज्ञापन गटका
जो मिल जाये खाता जा रे
बस विज्ञापन लाता जा रे

महंगाई की ख़बरेँ छोड़
महंगी शादी देखने दौड़
क्या रखा है महंगाई मेँ
ख़बर छिपी है शहनाई मेँ
छोड़ दे अब ये चीख़ पुकार
सीख ले कहना "जी सरकार "
नेताओँ के समझ इशारे
नोट पकड़ और लगा दे नारे

दूध पिला कभी गणेश जी को
कभी दिखा दे मीठा पानी
झूठ को भी सच बतलाने मेँ
मत करना तू आना कानी
लेखन तो है एक व्यापार
पैदल मत चल ले ले कार
बस ऐसा ही करता जा रे
अपनी जेबेँ भरता जा रे...
................
"
बूँद"
20.04.2008
(
पिथौरागढ़)

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

अबला नहीँ नारी

आश्रित नहीँ, शाषित नहीँ, दुखिया न बेचारी
निर्बल नहीँ, दुर्बल नहीँ, अबला नहीँ नारी

संज्ञा मिली देवी की पर प्रतिमा से बढ़कर कुछ नहीँ
श्रृंगार देवी सा किया अधिकार खुद पर कुछ नहीँ

संज्ञा नहीँ, प्रतिमा नहीँ, उपमा नहीँ नारी
निर्बल नहीँ, दुर्बल नहीँ, अबला नहीँ नारी

माँ यही, बेटी यही, पत्नी यही बनती रही
अपमान सहकर उम्रभर बस बच्चे ही जनती रही

रमणी नहीँ, जननी नहीँ, रजनी नहीँ नारी
निर्बल नहीँ, दुर्बल नहीँ, अबला नहीँ नारी

सोच पर पहरे बहुत आवाज़ भी मुट्ठी मेँ है
सहना ही संस्कार है शालीनता चुप्पी मेँ है

शबरी नहीँ, सीता नहीँ, राधा नहीँ नारी
निर्बल नहीँ, दुर्बल नहीँ, अबला नहीँ नारी

सरिता है वो, वनिता है वो, महिला है वो, उत्सव है वो,
साथी है वो, समता है वो, इंसान है, मानव है वो

मुस्कान है, अरमान है, सम्मान है नारी
*****
"बूँद"
8 मार्च 2007
(पिथौरागढ़)

मारपीट करने का अवसर 14 फरवरी बना लिया
















प्रेमी युगलोँ पर तुम बंधू मत यूँ अत्याचार करो
देखो प्यारे ढोँग छोड़ दो प्रेम को भी स्वीकार करो

मारपीट करने का अवसर 14 फरवरी बना लिया
बिन सोचे समझे तुमने जो चाहा शायद वही किया

प्रेमी युगलोँ का यूँ मिलना तुम्हेँ हमेशा खलता है
और अगर तुम स्वयं करो तो कहते हो "सब चलता है"

देखेँ तो इस दुनियाँ मेँ त्योहारोँ की भरमार है
हर रिश्ते के लिए जगत मेँ आदर है सत्कार है

एक विरोधाभाष देखकर मन उलझा सा जाता है
हर त्योहार मेँ प्रेम है मिलता प्रेम दिवस मेँ मार है

कृष्ण गोपियोँ की कहानियाँ तुम्हीँ लोग तो गाते हो
शंकर गौरा मिले हिमालय मेँ तुम ही बतलाते हो

प्रेम से इतनी नफ़रत है तो कहाँनियोँ को कफ़न करो
या फिर शंकर कृष्ण राम की मूरत सारी दफ़न करो

इन्हीँ कथाओँ मेँ तुम होते तो क्या ऐसे ही चिल्लाते?
कृष्ण गोपियोँ गौरा शंकर को तुम यूँ ही मार भगाते?

+++++

"बूँद"
14 फरवरी 2008
(पिथौरागढ़)

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

कैसी खुशियाँ कैसी बधाई ?






संघर्षों से राज्य था पाया
पर अब लगता है ये पराया
आशाओं के बीज थे बोये
फसलें खोयी, बंजर पाया

आन्दोलन तो बहुत बड़ा था
पर ज़मीन पर कहाँ खड़ा था
इक तूफ़ान था गुज़र गया है
जो कुछ पाया बिखर गया है

आज रामपुर भुला दिया है
और खटीमा याद नहीं है
गैरसैंन की बात ही छोडो
मुजफ्फर तक याद नहीं है

पी पी और बम्बैया पनपे
भ्रष्टाचारी खड़े हैं तनके
अपराधों का ग्राफ बढ़ा है
शिक्षा खड़ी है वेश्या बनके

नेताओं के वारे न्यारे
नौकरशाही पांव पसारे
ठेके पर सरकार चल रही
घोटालों मैं मंत्री सारे

गुंडों को तमगे हैं बांटे
आन्दोलनकारी बतलाया
नेताओं ने रिश्तेदारों को
सचिवालय मैं बैठाया

नाम जो नाजों से रखा था
वो भी हमने भीख मैं पाया
चले गए थे जिनके द्वारा
फिर क्यूँ उनको राज थमाया

जिसने हर पल टांग अड़ाई
उसने ही गद्दी है पाई
फिर भी हमको शर्म न आई
कैसी खुशियाँ कैसी बधाई

आन्दोलन को ख़त्म कर दिया
नौ नवम्बर एक साजिश थी
अवसरवादी लूट ले गए
सीने मैं जितनी ख्वाहिश थी

भूल गए वो लाखों सपने
जिनके लिए था खून बहाया
छले गए थे इसी दिवस को
फिर ये कैसा जश्न मनाया ?
 ---
विक्रम सिंह नेगी "बूँद"
०९-११-२००२ 
(पिथौरागढ़) 




सोमवार, 31 जनवरी 2011

भूखे सोते पेट कई हैं
















भूखे सोते पेट कई हैं
कुदरत के आखेट कई हैं
कहीं ठिठुरती पूस के रातें
आग बरसते जेठ कई हैं

कहीं है बोझ उठता बचपन
कहीं है कठपुतली सा यौवन
फुटपाथों पर सोता जीवन
बेबस तन-मन ढोता जीवन
खून पसीना बिकता सस्ता
मजबूरी के रेट कई हैं
भूखे सोते पेट कई हैं

नंगे बदन सरकता बचपन
चिथड़ों से तन ढकता यौवन
धुंए में लिपटा हुवा बुढ़ापा
काँप रहा तन, हांफ रहा मन
घुद्ती साँसें, फटती आंतें
यहाँ मौत के गेट कई हैं
भूखे सोते पेट कई हैं
..............
विक्रम सिंह नेगी "बूँद"
(पिथौरागढ़)

शनिवार, 29 जनवरी 2011

बाबूजी ये दिल्ली है...!

















गर्मी मेँ जलता शोला
सर्दी मेँ बरफ की सिल्ली है
समझ न आये मिज़ाज़ इसका
बाबूजी ये दिल्ली है...!

कभी हुआ ग़र यहाँ पे आना
चकाचौँध मेँ मत खो जाना
अजनबियोँ से बात न करना
दूर ही रहना पास न जाना
कौन कहाँ किस बात पे भड़के
सब माचिस की तिल्ली हैँ
बाबूजी ये दिल्ली है....

कोई बर्तन मांज रहा है
कोई रिक्शा हाँक रहा है
कोई सिर पे बोझ उठाये
काँप रहा है हाँफ रहा है
ग़रीब मजबूरोँ की हर पल
यहाँ पे उड़ती खिल्ली है
बाबूजी ये दिल्ली है....

सपने लेकर इस नगरी मेँ
हर दिन लाखोँ आते हैँ
धीरे धीरे वो सब भी
इस भीड़ मेँ गुम हो जाते हैँ
कोई यहाँ पे मोहम्मद तुग़लक
कोई शेख चिल्ली है
बाबूजी ये दिल्ली है....

(विक्रम नेगी "बूँद")
2005, जून, आज़ादपुर (दिल्ली)

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

जिह्वा भय से क्योँ कंपित है?

शंकित हैँ आशंकित हैँ
प्रतिपल प्रतिक्षण आतंकित हैँ

घनघोर निराशा है फैली
चहुँओर हताशा है फैली
सब मौन पड़े चुपचाप खड़े
अपने शब्दोँ से वंचित हैँ

कैसा मौलिक अधिकार मिला
मानव बौद्धिक लाचार मिला
अभिव्यक्ति व्यक्त नहीँ कर पाता
प्रतिशब्द सत्य पर दंडित है

सब कुछ आँखोँ के सम्मुख है
बस इसी बात का ही दुख है
नंगी आँखेँ सब देखती हैँ
जिह्वा भय से क्योँ कंपित है?
..............
"बूँद"
14.01.2005
(पिथौरागढ़)

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

हमें चापलूसियों का आता नहीं है धंधा
















अच्छे को कहें अच्छा गंदे को कहें गन्दा
हमें चापलूसियों  का आता नहीं है धंधा

कोई यहाँ पे नरपति कोई बने वरदायी
रासो के रचियताओं की बाढ़ सी है आई 
चारण बने हैं सारे गुणगान मैं लगे हैं
कुछ ने लगाया मक्खन कुछ ने मली मलाई

किसी का जोर चल पड़ा किसी का रहा मंदा
हमें चापलूसियों  का आता नहीं है धंधा


हम जानते हैं कविता अधिकार है हमारा
अन्याय से लड़ने का हथियार है हमारा
कवितायेँ तो बदलाव की द्योतक सदा रही हैं
बदलाव के लिए यह औजार है हमारा

छीलते हैं खाल सबकी इसको बनाके रंदा
हमें चापलूसियों  का आता नहीं है धंधा


हर गद्य को उलट कर कोई पद्य कह रहा है
कोई बेतुकी तुकबंदी को काव्य कह रहा है
वर्चस्व की लड़ाई सब लड़ रहे यहाँ पर
एक दुसरे की कविता हर कोई सह रहा है

कर रहे हैं तैयार हम इन्ही के लिए फंदा
हमें चापलूसियों  का आता नहीं है धंधा


हम गीत नहीं गाते बस पोल खोलते हैं
जो बात लगे सच्ची वो बोल बोलते हैं
अपनी बढ़ाई करना भी हमें नहीं आता
हम अपने आप को भी हर रोज़ तोलते हैं

कविता की आढ़ में हम लेते नहीं हैं चंदा
हमें चापलूसियों  का आता नहीं है धंधा
....................
विक्रम सिंह नेगी "बूँद"
(पिथौरागढ़)    

बुधवार, 26 जनवरी 2011

क्या होगा इस देश का यारो?

कार चाहिए, यार चाहिए
इक अच्छा डांसबार चाहिए
फाइल नहीँ, मोबाइल चाहिए
एक अनोखी स्टाइल चाहिए
गर्ल्स की लंबी लाइन चाहिए
और बालोँ मेँ शाइन चाहिए
एक अट्रैक्टिव फेस चाहिए
इक सपनोँ का देश चाहिए
एक शॉटकट रोड चाहिए
न कंधोँ पर लोड चाहिए
धैर्य नहीँ है, बेकरार हैँ
लगी हुई लंबी कतार है
कैसे होँगे पूरे सपने
यूथ लगे हैँ कहाँ भटकने
दौड़ रहे हैँ अंधकार मेँ
झूम रहे हैँ बियरबार मेँ
राह सही है या ग़लत है
सपनोँ को पाने की ललक है
कहाँ चले हैँ, पता नहीँ है
कहाँ खड़े हैँ, पता नहीँ है
रुपयोँ मेँ ही उलझ रहे हैँ
एड्स अग्नि मेँ झुलस रहे हैँ
कन्याओँ के केश कटे हैँ
कपड़े भी कुछ घटे घटे हैँ
लाज़ की रेखा पार कर रही
देह से वो व्यापार कर रही
कहाँ है मंज़िल खबर नहीँ है
कोई सुनिश्चित डगर नहीँ है
न जाने ये कैसी प्यास है
आज हर युवक देवदास है
शर्म लाज़ छोड़ चुकी है पारो
क्या होगा इस देश का यारो?
......................
(विक्रम नेगी "बूँद")
2001, पिथौरागढ़

ये कैसा सवेरा?












न चंदा गगन पे न सूरज ज़मीँ पर
न तारे न जुगनू न पंछी कहीँ पर
न पर्वत हैँ ऊँचे न बादल घनेरे
न कुहरा घना है न फैला धुँआ है
फिर भी न जाने उजाला कहाँ है
चहूँ ओर फैला है अब तक अंधेरा...
ये कैसा सवेरा? ये कैसा सवेरा?

हवाओँ मेँ अब तक ये कैसी है गरमी
ज़माने के रुख मेँ नहीँ आई नरमी
है राहोँ मेँ हरदम ये कैसी रुकावट
ये रस्मो रिवाज़ोँ की झूठी बनावट
नहीँ टूटा अब तक ये पहरोँ का घेरा...
ये कैसा सवेरा?ये कैसा सवेरा?

कहाँ खो गये हैँ मेरे सारे सपने
न आया समझ मेँ हैँ कौन मेरे अपने
जिन्होँने था पाला समझ कर पराया
या जिसने मुझे अपनी दासी बनाया
कहाँ रह गया घर कहाँ मेरा डेरा...?
ये कैसा सवेरा?ये कैसा सवेरा?

न माँ की दुलारी न बाबा की प्यारी
हमेशा ही माँ बाप के मन पे भारी
सदा खामोशी मेँ ये जीवन बिताया
मुझे ऐसे जीना था किसने सिखाया?
बनी बीन हरदम ये जग था सपेरा...
ये कैसा सवेरा?ये कैसा सवेरा?

मिटी ख्वाहिशेँ और लुटे ख्वाब सारे
हैँ मरघट के जैसे ये सारे नज़ारे
मेरे ख्वाहिशोँ की ये लाशेँ टंगी हैँ
समझ मेँ न आया ये क्या ज़िंदगी है?
रहा ज़िस्म ज़िंदा मरा मन था मेरा...
ये कैसा सवेरा? ये कैसा सवेरा?

न आज़ाद थी मैँ न खुश थी जहां मेँ
यही सोचती रोज आई कहाँ मैँ?
न जी पाई बचपन न देखी जवानी
न लिख पाई मैँ अपनी ख़ुद की कहानी
मेरी ज़िंदगी मेँ है अब तक अंधेरा...
ये कैसा सवेरा? ये कैसा सवेरा?
.......................
(विक्रम नेगी "बूँद")
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