बुधवार, 23 मई 2012

आओ, पहाड़ सुनना चाहता है अपना दर्द, तुम्हारी जुबानी

















आओ,
पहाड़ आओ,
टूटी-फूटी सड़कों ने अपने ज़ख्म भर लिए हैं,
तुम्हारी गाड़ियों के टायरों को अब थकान महसूस नहीं होगी,
पहाड़ इतना भी बेशर्म नहीं है
कि तुम्हारा ख्याल न रखे

आओ,
पहाड़ बेचैन है,
तुम्हारी यात्राओं का वर्णन सुनने के लिए,
न जाने कितनी बार तुम पहाड़ की छाती पर टहलते हुए निकले,
अस्कोट से आराकोट

आओ,
पहाड़ जानना चाहता है
अपनी कीमत,
जो तुम्हारी किताबों में प्रिंट है,
उसे सिर्फ इतना पता है
कि लकड़ी, पत्थर, मिट्टी, रेता, बजरी से बना
उसका जिस्म रोज बिकता है,

वो समझना चाहता है कि
उसकी आबरू, उसकी संवेदनाओं की कीमत कैसे तय होती है,
पहाड़ देखना चाहता है,
तुम्हारी मोटी-मोटी किताबें,
उसे मालूम नहीं तुम्हारा अर्थशास्त्र,
पहाड़ की गणित कमज़ोर है,

उसे पता नहीं था,
कि वो इतना कीमती है,
पहाड़ अनपढ़ है,
उसे तुम्हारी तरह लिखना नहीं आता,
पहाड़ सुनना चाहता है,
अपना दर्द
तुम्हारी जुबानी,
आओ,
घाट का पुल तुम्हारे इंतज़ार में आँखें बिछाए खड़ा है.....!
...
"बूँद"
२३ मई २०१२

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