मंगलवार, 5 जून 2012


आओ
पहाड़ आओ,
अपने कैमरे साथ ले आना
झोड़ा-चांचरी, छोलिया नृत्य,
सातूं-आठूं, जागर,
सब कैद कर ले जाओ,
दो-चार बूढ़ी हड्डियां तुम्हें हर गांव में मिल जाएँगी,
जिनके साथ तुम थोड़ी देर हुक्का गुडगुडा सकते हो,
दो-चार मडुवे की रोटियां तोड़कर उनके साथ
तुम वो सब उगलवा सकते हो
जो तुम्हें अपनी किताबों में लिखने के लिए चाहिए

आओ,
मंचों पर अपनी बेबसी की गाथा सुनाते
लोककलाकार तुम्हारे कानों को तरस रहे हैं.
और वो भी
बैठे हैं तुम्हारे इंतज़ार में
जिन्हें भ्रम है कि वो लोककलाओं को बचाने का बहुत बड़ा काम कर रहे हैं...

आओ
पहाड़ की आखिरी पारंपरिक शादी को कैद कर ले जाओ,
डोली में बैठकर ससुराल जाती आखिरी दुल्हन की तस्वीर समेट लो
तुम्हारी किताबों के मुख्य पृष्ठ पर
बहुत सुन्दर लगेगी वो तस्वीर....

आओ
पहाड़ आओ
बूढ़ी हड्डियां अब गलने लगी हैं,
मकड़ियों के जाल तुमसे पहले पहुच गए हैं,
पहाड़ के पुराने घरों की दीवारों में,
जल्दी आओ,
वरना तुम्हें निराशा के सिवा कुछ नहीं मिलेगा,
दौडाओ अपने गणों को
पूछो-
कौन, कहाँ, किस गाँव में अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है,
आने से पहले
अपने कैमरे की वोईस क्लीयरिटी चेक कर लेना
मसकबीन पुरानी हो तो आवाज़ साफ़ सुनाई नहीं देती....

आओ
खत्म होती साँसें तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं...!
......
("बूँद")
०४  जून २०१२

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