सोमवार, 23 दिसंबर 2013

रातभर ओले पड़ते रहे..

रातभर ओले पड़ते रहे,
टीन की छत-
ढोल-नगाडों की तरह,
जश्न मनाती रही तबाही का...

सुबह हुई तो देख रहा हूँ-
पेड़ों की तमाम पत्तियां टूट कर आँगन में बिखरी पड़ी हुई हैं,
कल तक जो सब्जी के पौधे क्यारियों में,
कतारों में खड़े होकर लहलहाया करते थे-
आज रोनी सी सूरत लेकर उदास बैठे हैं....

इधर तो बस उदासी का आलम है,
उधर गाँव का हाल न जाने क्या होगा.....

(बूंद)

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